• May 25, 2024
 1662 के दशहरे की याद ताज़ा करेगा इस वर्ष का दशहरा
  • सन् 1651 से लेकर अब तक का सफर
  • 1662 के दशहरे की याद ताज़ा करेगा इस वर्ष का दशहरा
  • इस वर्ष कुल्लू में दशहरे का आयोजन 15 से 21 अक्टूबर तक किया जा रहा है।

 

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विशिष्ठ परम्पराओं के चलते देवभूमि हिमाचल की कुल्लू घाटी के दशहरा उत्सव की देश भर में विशेष पहचान है। कुल्लू का दशहरा पर्व परंपरा, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आश्विन मास की दशमी को घाटी के अधिष्ठाता देव भगवान राम के रघुनाथ जी स्वरूप की भव्य रथयात्रा से दशहरा उत्सव का शुभारम्भ होता है, जिसमें सभी स्थानीय देवी-देवता ढोल-नगाड़ों की धुनों पर नाचते हुए इस देव मिलन में आते हैं। देव व मनुष्य के अनूठे मिलन से पूरा माहौल देवमय हो जाता है।

हिमालय की पीर पंजाल पर्वत श्रृंखलाओं में बसी कुल्लू घाटी का यह अनूठा मिलन ऐतिहासिक मेला यूं ही अंतरराष्ट्रीय उत्सव नहीं बन गया। इसके पीछे बहुत महत्वपूर्ण आयाम हैं, जिससे इस समारोह को पहले राज्य, फिर राष्ट्रीय और अब अंतरराष्ट्रीय उत्सव का दर्जा हासिल हुआ है। कुल्लू दशहरा उत्सव समूची घाटी के ग्रामीण लोगों की देव आस्था एवं सामाजिक प्रतिष्ठा का ही प्रतीक नहीं, बल्कि जिला की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक सद्भाव का आईना और व्यापार का भी प्रमुख केंद्र है।

1651 ईस्वी से आरम्भ हुए कुल्लू दशहरा उत्सव का स्वरूप आज इतना वृहद हो गया है कि सात दिनों तक रोजाना लाखों लोग शिरकत करते हैं। इस बार का दशहरा पर्व निश्चित तौर पर 1662 ईस्वी में ढालपुर मैदान में मनाए गए दशहरे की याद दिलाएगा। वही रूप, वही स्वरूप, वही देवी-देवता और वही ढालपुर मैदान। ढालपुर मैदान में जब दशहरा पर्व पहली बार सन् 1662 में मनाया गया था तो उस समय सिर्फ देव परंपराओं से ही यह पर्व शुरू हुआ था। न तो कोई व्यापार था और न ही किसी तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम। लिहाजा 359 वर्षों बाद वही इतिहास दोहराने जा रहा है।

कुल्लू दशहरे का इतिहास

कुल्लू घाटी का परिदृश्य 17वीं शताब्दी के मध्य में बदल गया, जब एक नाटकीय घटनाक्रम में प्रभु राम अयोध्या से यहां आए और कुल्लू में शैव मत के साथ ही वैष्णव मत का भी उदय हुआ। कहा जाता है कि सन् 1650 के दौरान कुल्लू के राजा जगत सिंह को ब्रह्म हत्या का शाप लग गया, जिससे उन्हें कोड़ हो गया और कोई भी औषधि उन्हें स्वस्थ नहीं कर पाई। ऐसे में एक बाबा पयहारी ने उन्हें बताया कि अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान रघुनाथ की मूर्ति यहां लाकर यदि राजा उसके चरणामृत का सेवन व स्नान करेंगे तो लाभ होगा। इस पर पंडित दामोदर को वहां से मूर्ति लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बताया जाता है कि काफी प्रयत्न करके जब मूर्ति को चुराकर हरिद्वार पहुंचे तो वहां उन्हें पकड़ लिया गया। उस समय ऐसा करिश्मा हुआ कि जब अयोध्या के पंडित मूर्ति को वापिस ले जाने लगे तो वह मूर्ति इतनी भारी हो गई कि कई व्यक्तियों के उठाने पर भी नहीं उठी और जब यहां के पंडित दामोदर ने उठाया तो मूर्ति फूल के समान हल्की हो गई। ऐसे में पूरे प्रकरण को स्वयं भगवान रघुनाथ जी की लीला जानकर अयोध्यावासियों ने मूर्ति को कुल्लू ले जाने दिया।

रघुनाथ जी की मूर्ति को कुल्लू में स्थापित किया गया और इस उपलक्ष्य पर राजा जगत सिंह ने यहां के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, जिन्होंने भगवान रघुनाथ जी को सबसे बड़ा देवता मान लिया। इसके साथ ही राजा ने भी अपना राजपाठ त्याग कर भगवान को अर्पण कर स्वयं उनके मुख्य सेवक बन गए। यह परंपरा आज भी कायम है, जिसमें राज परिवार का सदस्य रघुनाथ जी का छड़ीबरदार होता है। इसके बाद से ही देव मिलन का प्रतीक दशहरा उत्सव आरंभ हुआ, जिसमें प्राचीन काल से लेकर ही घाटी के सैकड़ों देवी-देवता आकर रघुनाथ के दरबार में हाजिरी भरते हैं।

अयोध्या की तर्ज पर मनाया जाता है उत्सव

देश के बाकी हिस्सों में जहां विजय दशमी पर दशहरा उत्सव समाप्त हो जाता है, वहीं सदियों पुराना कुल्लू दशहरा उत्सव विजय दशमी के दिन ही शुरू होता है। दशमी के दिन भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई की थी और यह युद्ध सात दिनों तक चला, पूर्णिमा के दिन रावण का वध हुआ था। इसी तर्ज पर तिथि के आधार पर कुल्लू में दशहरा उत्सव मनाया जाता है।

पीज व कमांद के जंगलों से आती है लकड़ी

भगवान रघुनाथ जी के रथ के निर्माण के लिए पहले घाटी के पीज व मंडी जिला के कमांद स्थित पराशर ऋषि के जंगलों से लकड़ी लाई जाती थी। उस समय रथ को रखने के लिए कोई उपयुक्त स्थान नहीं था जिसके चलते हर छठे या सातवें साल रथ का निर्माण करवाना पड़ता था। लेकिन स्व. राजा महेंद्र सिंह ने जंगलों को बचाने के उद्देश्य से रथ को रखने के लिए ढालपुर स्थित एक मैदान में एक कमरे का निर्माण करवाया था जिसके बाद रथ वहीं पर रखा जाता है। करीब 35 वर्षों से वही रथ इस्तेमाल किया जा रहा है। रथ को कुल्लू घाटी के भुलंग स्थित शूया गांव का विश्वकर्मा परिवार ही बनाता है। वर्तमान समय में हरि सिंह कारीगर हर साल रथ की जांच करता है और उसके बाद ही रथयात्रा में रथ को शामिल किया जाता है। दशहरा उत्सव के बाद हर साल रथ को ढालपुर स्थित रथ मैदान में बने कमरे में रखा जाता है।

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